बस एक सवाल: और कितने संतोष महादिक शहीद होंगे?

colonel-760 कहूं आंखें भर आई थीं जब शहीद कर्नल संतोष महादिक के दो छोटे-छोटे बच्चों को मुखाग्नि देते हुए देखा। वहीं शहीद कर्नल की पत्नी स्वाती महादिक कहती हैं कि दोनों बच्चों को देश सेवा के लिए समर्पित करेंगी। बेटे को आर्मी में और बिटिया को डॉक्टर बनाएंगी।

जम्मू कश्मीर के कुपवाड़ा में इस बहादुर जवान ने हमारी रक्षा के लिए अपना बलिदान दे दिया, लेकिन हमें क्या करना मरता है मर जाने दो, हमारे पास वैसे ही बहुत सारी खुद की समस्याएं हैं, उन्हें तो सुलझा नहीं पा रहे, देश की समस्या कैसे सुलझाएंगे?

पाकिस्तान के सिपाही हमारे जवान का सर काटकर ले जाते हैं और उससे फुटबॉल खेलते हैं, लेकिन हिंदुस्तानियों को क्रिकेट देखने से फुर्सत ही नहीं मिलती। रोज जवानों के मरने की खबर टीवी पर देखते हैं या रेडियो पर सुनते हैं, अखबार में पढ़ते हैं।

क्यों भैया क्यूं दिखाते हैं, सुनाते हैं, क्यों पढ़ाते हैं मीडिया वाले? कि भैया जाग जाओ… आजादी के बाद से हिंदुस्तान कश्मीर के लिए पाकिस्तान से सीधे तौर पर 3 जंग (1947-48, 1965, 1999) लड़ चुका है। इस दौरान हिंदुस्तान अपने लगभग 8000 बेटों का बलिदान दे चुका है।

किसी राज्य को विकास के मार्ग पर और पतन के मार्ग पर ले जाना उस राज्य की प्रजा के हाथों में होता है…

1947-48 के युद्ध में 1,500 जवान शहीद और 3,500 घायल, 1965 के युद्ध में शहीदी का आकड़ा दोगुना हो गया -3000, हजारों और घायल और सैकड़ों बंदी बना लिए गए। आखिर में 1999 में करगिल में हमारे जवानों को बेरहमी से मारा, लेकिन हमारे जवानों ने भी हार नहीं मानी उस दौरान 527 जवान शहीद, और सैकड़ों घायल हुए। इन बहादुरों में से परमवीर चक्र विजेता कैप्टन विक्रम बत्रा भी थे, उन्हें पाकिस्तानी अपने इंटरसेप्टेड संदेशों में शेरशाह कहते थे।

हिंदुस्तानी जवानों के कई सारे ऐसे किस्से हैं जिन्हें सुनें तो रोंगटें खड़े हो जातै हैं। लेकिन बात मुद्दे की ये है कि जैसे अमेरिका के लिए वियतनाम युद्ध और रसिया के लिए अफगान युद्ध नासूर बन गए थे वैसे ही कश्मीर का मुद्दा भी भारत के लिए नासूर बन गया है।

ये हमारे जवानों के लिए दलदल के समान है, जिसकी भेंट हर रोज हिंदुस्तानी जवान चड़ रहै हैं। अमेरिकी फौज जब अफगानिस्तान में आतंकवादियों के द्वारा मारे जा रहे थे तब वहां के नागरिकों ने सरकार के खिलाफ प्रदर्शन कर अपनी फौज को सुरक्षित घर वापिस लाने के लिए मुहिम छेड़ी थी, क्योंकि वे फिर से एक बार वियतनाम का घाव लेना नहीं चाहते थे।

इसी हिसाब से क्या हिंदुस्तान की आवाम सरकार पर कश्मीर मुद्दे को हल करने के लिए दवाब नहीं बना सकती? जिस तरह से आरक्षण के लिए पागलों की तरह सड़क पर तमाशा करते हैं, रेल पटरियों पर बिस्तर जमाते हैं, एक आदमी की मौत पर सैकड़ों अवार्ड लौटा सकते हो, हजारों सैनिकों की मौत पर कोई एक काम ही कर दो। असहिष्णुता और सहिष्णुता को लेकर मार्च निकाला क्या वैसे ही अपने सैनिकों की सलामती के लिए मार्च नहीं निकाल सकते?

बंदूक नहीं उठा सकते तो कम से कम कलम ही उठा लीजिए और भेज दीजिए करोड़ों संदेश सरकार को। बता दीजिए कि जवान की कीमत इतनी सस्ती नहीं है कि आपके पाले हुए चंद मुजाहिद्दीनों के हाथों शहीद होता रहे।

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